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समसामयिक मुद्दे भाग 4: भारत में खालिस्तानी अलगाववादी आंदोलन में विदेशी षड्यंत्र की संभावित भूमिका

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भारत में खालिस्तानी अलगाववादी आंदोलन में विदेशी षड्यंत्र की संभावित भूमिका

खालिस्तान का मुद्दा भारत और उसके कई देशों के साथ संबंधों को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता रहा है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में कई अवसरों पर ऐसी घटनाएं देखी गई हैं, जब खालिस्तान आंदोलन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देने की बात सामने आई है। चूंकि यह मुद्दा भारत के एक मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ा हुआ है, इसलिए विदेशी धरती पर ऐसे किसी प्रकरण और गतिविधि पर नियंत्रण करने के लिए द्विपक्षीय स्तर पर कई प्रकार के उपाय करने अपेक्षित हो जाते हैं। हाल ही में ऐसा मुद्दा कनाडा में फिर से उभरा, जब कनाडा के ब्रांपटन शहर में खालिस्तानी अराजक तत्वों ने ऑपरेशन ब्लू स्टार की 39वीं वर्षगांठ को सेलिब्रेट किया। इसके लिए खालिस्तानी तत्वों ने ब्रांपटन शहर में एक परेड का आयोजन भी किया। इस संदर्भ में सोशल मीडिया पर एक 6 सेकंड का विडियो क्लिप भी प्रसारित किया गया जिसमें कनाडा की सड़कों पर किए गए परेड में भूतपूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या पर प्रसन्नता जाहिर की गई है। 5 किलोमीटर लंबी इस परेड की एक झांकी में इंदिरा गांधी की हत्या का सीन दिखाया गया। झांकी में इंदिरा गांधी को खून से सनी साड़ी पहने दिखाया गया है, उनके हाथ ऊपर हैं, दूसरी तरफ दो व्यक्ति उनकी तरफ बंदूक ताने खड़े हैं। इसके पीछे लिखा था- 'बदला' 


इस गंभीर घटना के बाद भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कनाडा में मनाए गए इस जश्न पर कड़ी टिप्पणी की। भारत के विदेश मंत्री का कहना था कि कनाडा लगातार अलगाववादियों, चरमपंथियों और हिंसा का समर्थन करने वालों को फलने-फूलने का मौका दे रहा है तथा भारत को इसकी वजह समझ नहीं आती सिवाए इसके कि ये वोट बैंक की जरूरत है। विदेश मंत्री ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उन्हें लगता है कि ये आपसी रिश्तों और कनाडा के लिए ठीक नहीं है। भारत में कनाडा के उच्चायोग ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि कनाडा में नफरत और हिंसा के महिमामंडन के लिए कोई जगह नहीं है। कनाडा के उच्चायुक्त कैमरन मैके ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है कि 'मैं कनाडा में आयोजित उस कार्यक्रम की खबरें सुनकर दंग हूं जिसमें दिवंगत भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या का जश्न मनाया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि मैं इस तरह की गतिविधियों की स्पष्ट रूप से निंदा करता हूं।'


चूंकि ऐसे प्रकरण विभाजनकारी राजनीति भारत में धार्मिक समुदायों के मध्य शत्रुता और द्वेष की भावना को बढ़ावा दे सकते हैं. इसलिए ऐसे मुद्दे से संवेदनशील तरीके से निपटना जरूरी हो जाता है। भले ही कनाडा ने कह दिया है कि उसे खालिस्तानी प्रदर्शनकारियों की परेड का अफसोस है लेकिन निर्णायक कार्यवाही अभी शेष है। विदेशी धरती पर भारत को निशाना बनाने का यह पहला अवसर नहीं है। भारत विरोधी जनमत संग्रह, इवेंट्स आयोजित करना, हिंदू मंदिरों को विरूपित करने का प्रयास करना भारतीयों के खिलाफ हिंसक गतिविधियां देखी गई हैं। इसलिए खालिस्तानी अलगाववादियों से निपटने के लिए ठोस रणनीति पर कार्य करना आवश्यक हो गया है। यहीं कारण है कि केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री मीनाक्षी लेखी ने कनाडा सरकार से आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने की मांग की है और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चेतावनी भी दे डाली है कि कनाडा के साथ भारत के संबंध इस तरह की घटनाओं के चलते खराब भी हो सकते हैं। कोई भी हत्या की घटना एक अपराध है और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इसका बिल्कुल भी जश्न नहीं मनाया जा सकता। यह सब कनाडा में हुआ है जो कनाडा सरकार को कानून व्यवस्था के अंतर्गत आता है, ऐसे में कनाडा सरकार को सख्त कार्यवाही करनी चाहिए।

खालिस्तान की मांग का इतिहास

  • खालसा शब्द अरबी भाषा के खालिस से बना है जिसका अर्थ होता है- शुद्ध। गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में सिख धर्म में खालसा पंथ की स्थापना की थी। खालिस्तान इसी खालसा से बना है जिसका मतलब है- खालसाओं का राज।
  • खालिस्तान शब्द पहली बार 1940 में सामने आया था, जब मुस्लिम लीग के लाहौर घोषणापत्र के जवाब में डॉक्टर वीर सिंह भट्टी ने एक पैम्फलेट में इसका इस्तेमाल किया था।
  • इसके बाद 1966 में भाषाई आधार पर पंजाब के 'पुनर्गठन' से पहले अकाली नेताओं ने पहली बार 60 के दशक में सिखों के लिए स्वायत्तता का मुद्दा उठाया था।
  • 1970 के दशक की शुरुआत में चरण सिंह पंछी और डॉक्टर जगजीत सिंह चौहान ने पहली बार खालिस्तान की मांग की थी। डॉक्टर जगजीत सिंह चौहान ने 70 के दशक में ब्रिटेन को बेस बनाया तथा अमेरिका और पाकिस्तान भी गए। 1978 में चंडीगढ़ के कुछ नौजवान सिखों ने खालिस्तान की मांग करते हुए दल खालसा का गठन किया।
  • खालिस्तान आंदोलन में आनंदपुर का नाम अहम रहा है। खालिस्तान आंदोलन के अगुवा मास्टर तारा सिंह के निधन के बाद 1973 में पहली बार यहीं पर खालिस्तान को लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया था। आनंदपुर साहिब में ही सिखों के अंतिम गुरू गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी।
  • अकाली आंदोलन के संस्थापक सदस्य मास्टर तारा सिंह ही खालिस्तान आंदोलन के अगुवा थे। आजादी से पहले उन्हें उस वक्त मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग का समर्थन करने के लिए कहा था। बदले में जिन्ना ने उन्हें उप प्रधानमंत्री बना देने का वादा किया था, लेकिन तारा सिंह ने इस मांग को ठुकरा दिया था। आजादी के बाद खालिस्तान की मांग जोर पकड़ ली जिसकी बड़ी वजह पंजाब का विभाजन माना गया। पाकिस्तान के अलग होने के बाद पंजाब दो भागों में बंट गया, सिखों के कई प्रमुख गुरुद्वारे पाकिस्तान शासित पंजाब में चले गए जिसका मास्टर तारा सिंह ने विरोध किया।
  • 1956 में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और मास्टर तारा सिंह के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें सिखों के आर्थिक, शैक्षणिक और धार्मिक हितों की रक्षा की बात कही गई थी लेकिन यह समझौता 5 साल तक ही चला और फिर टूट गया। मास्टर तारा सिंह ने 1961 में अलग पंजाबी सूबे की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू कर दिया था और तारा सिंह के समर्थन में हजारों सिख एकजुट हो गए। सिखों का कहना था कि भाषा के आधार पर अलग पंजाब राज्य का गठन हो और गुरुमुखी को भी भाषाओं की सूची में शामिल किया जाए। इस आंदोलन को उनकी बेटी राजेंद्र कौर ने खत्म करवाया। 1966 में भाषा के आधार पर पंजाब को अलग राज्य बना दिया गया। हालांकि, चंडीगढ़ को अलग करते हुए केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। पंजाब में 1971 तक राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी रहा। 1971 में बांग्लादेश विभाजन के बाद पंजाब में इंदिरा गांधी को जबरदस्त सर्मथन मिला। इस चुनाव में अकालियों के लिए राजनीतिक संभावनाएं समाप्त हो गई थीं जिसके बाद अलग खालिस्तान की मांग शुरू हुई थी। 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब में एक प्रस्ताव पास किया और 1978 में भी इस प्रस्ताव को पुनः दोहराया गया। 

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में 3 मुख्य बातें कही गई थीं:
1. पंजाब को जम्मू-कश्मीर की तरह स्वायत्तता मिले जिसमें केवल रक्षा, विदेश, संचार और मुद्रा पर केंद्र का दखल रहे।
2. केंद्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ को पूरी तरह से पंजाब को सौंप दिया जाए।
3. पूरे देश में गुरुद्वारा समिति का निर्माण हो और सिखों को सेना में अधिक जगह मिले।

विदेशी धरती पर खालिस्तान की मांग और प्रदर्शनः

  • पिछले कुछ दशकों से अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों में रह रहे कई खालिस्तानी सिख चरमपंथियों द्वारा खालिस्तान की मांग उठाई जाती रही है। हालांकि उन देशों में रहने वाले सिखों के कई संगठन जो लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, उन्हें पंजाब में ज्यादा समर्थन नहीं मिला है। सिख फॉर जस्टिस अमेरिका स्थित एक ग्रुप है जो खालिस्तानी प्रदर्शनकारियों को लगातार लामबंद करने की कोशिश करता रहा है। भारत सरकार के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाने का कार्य यह संगठन प्रमुखता से करता है। इसके लिए भारतीय संघ की प्रादेशिक अखंडता और संप्रभुता का कोई मतलब नहीं है तथा पृथकतावादी मानसिकता के साथ ही यह संगठन सक्रिय है। भारत सरकार ने 10 जुलाई, 2019 को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम ( UAPA) के तहत इसे प्रतिबंधित कर दिया था जिसमें कहा गया था कि इस संगठन का अलगाववादी एजेंडा है।
  • सिख फॉर जस्टिस के मुताबिक उनका उद्देश्य सिखों के लिए एक स्वायत्त देश बनाना है जिसके लिए यह ग्रुप सिख समुदाय के लोगों का सहयोग लेने की कोशिश कर रहा है।
  • सिख फॉर जस्टिस की स्थापना वर्ष 2007 में अमेरिका में हुई थी। इस ग्रुप का प्रमुख चेहरा पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से लॉ ग्रेजुएट गुरपतवंत सिंह पन्नू है। गुरपतवंत सिंह पन्नू इस ग्रुप का कानूनी सलाहकार भी है। पन्नू ने खालिस्तान के समर्थन में 'रेफरेंडम 2020' (जनमत संग्रह) कराने का अभियान भी शुरू किया था। इस संस्था ने कनाडा तथा अन्य कई भागों में जनमत संग्रह कराया परन्तु अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में इसे कोई विशेष प्राथमिकता नहीं मिली थी। इसके बाद 2020 में ही भारत सरकार ने खालिस्तानी समूहों से जुड़े 9 लोगों को आतंकवादी घोषित किया और लगभग 40 खालिस्तान समर्थक वेबसाइटों को बंद कर दिया था।

खालिस्तानी अलगाववादियों से आईएसआई के संबंध:
खालिस्तानी आंदोलन और उससे जुड़े आंदोलनकारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा इसलिए भी हैं क्योंकि इनके आईएसआई के साथ लिंक होने के साक्ष्य कई अवसरों पर मिले हैं। आईएसआई से संबंधों का आरोप भारत की खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट पर आधारित है। खालिस्तानी कट्टरपंथी अमृतपाल सिंह पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी आईएसआई के जरिये भारत में हथियार मंगा रहा था। वह अपने कट्टरपंथी उपदेशों के जरिये पंजाब को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश करके विदेशी धरती पर सिखों को गुमराह करने के प्रयास करता रहा है। अमृतपाल सिंह ने युवाओं को हथियार संस्कृति की ओर ले जाने का काम किया। अमृतपाल और उसके सहयोगियों पर समाज में वैमनस्य फैलाने, हत्या के प्रयास, पुलिसकर्मियों पर हमला तथा सरकारी कर्मचारियों के काम में रुकावट डालने से जुड़े कई आपराधिक मामले दर्ज हैं।

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