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अगर मनोज न होते तो,अमिताभ बच्चन न होते! आखिर टूट ही गई 'जिंदगी की लड़ी'

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हिंदी सिनेमा के 'भारत कुमार', वह शख्सियत जिन्होंने देशभक्ति को सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, बल्कि अपने पूरे व्यक्तित्व में जिया-मनोज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी आवाज़ में जोश था, अदाकारी में जुनून और फिल्मों में हिंदुस्तान की आत्मा बसती थी। देश के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने उन्हें सिनेमा के जरिए एक ऐसा नायक बना दिया, जो वास्तविक जीवन में भी करोड़ों दिलों में देशप्रेम की लौ जलाता रहा। 87 वर्षीय इस महान अभिनेता ने मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में अंतिम सांस ली। मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार, वह मायोकार्डियल इन्फार्क्शन से उत्पन्न कार्डियोजेनिक शॉक के कारण दुनिया को अलविदा कह गए। इसके अलावा, वह पिछले कुछ महीनों से लिवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी से भी जूझ रहे थे।

Manoj kumar

आज पूरा भारत उनके योगदान को नमन कर रहा है, क्योंकि उन्होंने न केवल 'उपकार', 'शहीद', 'क्रांति' और 'पूरब और पश्चिम' जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को परिभाषित किया, बल्कि अपने जीवन से भी एक मिसाल कायम की। पर्दे पर भारत को जिया और आज भारत उन्हें अपनी यादों में संजो रहा है।

एक अभिनेता, जो देशभक्ति का पर्याय बन गया

साल 1937 में अबोटाबाद (तब ब्रिटिश भारत, अब पाकिस्तान) की धरती पर जन्मे हरिकृष्ण गोस्वामी को शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि एक दिन वे सिनेमा जगत में 'भारत कुमार' के नाम से अमर हो जाएंगे। जब सपनों को सच करने के लिए वे मुंबई पहुंचे, तो नाम बदला-मनोज कुमार। लेकिन ये बदलाव सिर्फ नाम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अपनी अदाकारी और विचारधारा से देशभक्ति को नए आयाम दिए। उनका नाम सिनेमा में देशप्रेम का प्रतीक बन गया, और आज भी, जब उनकी गूंज सुनाई देती है, तो दिल में वही जुनून जाग उठता है—जो उनकी फिल्मों ने हर भारतीय में जगाया था।

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कैसे 'फैशन' से निकलकर 'क्रांति' तक पहुंचे मनोज कुमार?

साल 1957 में ‘फैशन’ से शुरू हुआ सफर एक दिन ‘क्रांति’ बन जाएगा, शायद खुद मनोज कुमार ने भी नहीं सोचा था। 1960 की ‘कांच की गुड़िया’ ने उन्हें पहचान दिलाई, लेकिन असली मुकाम उन्हें तब मिला जब उन्होंने अपनी फिल्मों में देशभक्ति की भावना को आत्मसात किया। ‘उपकार’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘संन्यासी’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि ‘भारत कुमार’ बना दिया। उनका सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देशप्रेम का एक आंदोलन था, जिसकी गूंज आज भी कायम है।

मनोज कुमार ने सिनेमा के जरिए जगाई देशभक्ति की अलख

60 और 70 के दशक में मनोज कुमार हर फिल्ममेकर की पहली पसंद बन चुके थे। उन्होंने करीब 55 से 60 फिल्मों में अभिनय किया और 8 फिल्मों का निर्देशन भी किया। लेकिन उनका सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं था—वह समाज को संदेश देने का एक जरिया था। उनकी फिल्मों में देशभक्ति की भावना इतनी गहरी थी कि हर किरदार, हर संवाद हिंदुस्तान की मिट्टी की खुशबू से सराबोर लगता था।

जिसने अमिताभ को रोका और सिनेमा को संवारा

जब लगातार असफलताओं से हताश अमिताभ बच्चन मुंबई छोड़ने का मन बना चुके थे, तब मनोज कुमार ही थे जिन्होंने उन्हें रोका और ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में मौका दिया। एक ऐसे कलाकार, जिन्होंने सिर्फ 11 रुपए में कहानियां लिखीं, लेकिन सिनेमा को अनमोल विरासत दी। बेहतरीन अभिनय और योगदान के लिए उन्हें दादा साहब फाल्के, पद्मश्री और फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा गया। उनका सिनेमा सिर्फ पर्दे पर नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी प्रेरणा बनकर चमकता रहा।

'कसमें-वादे' : विवाद के बाद भी दिलों पर राज

साल 1967 में आई ‘उपकार’ ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाई, बल्कि मनोज कुमार को ‘भारत कुमार’ की उपाधि भी दिलाई। फिल्म का मशहूर गीत ‘कसमें वादे प्यार वफा’ आज भी श्रोताओं के दिलों में बसा हुआ है। पहले यह गाना किशोर कुमार को ऑफर हुआ था, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। वहीं, सेंसर बोर्ड ने हिंदू-मुस्लिम संदर्भ पर आपत्ति जताते हुए बदलाव किए। बावजूद इसके, मन्ना डे की आवाज और कल्याणजी-आनंदजी के संगीत ने इस गीत को अमर बना दिया, और यह विवादों से निकलकर भी सुपरहिट साबित हुआ।

सितारा जो सिनेमा से आसमान तक चमकता रहेगा

"जिंदगी की ना टूटे लड़ी, प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी..."यह गाना सुनते ही मनोज कुमार की फिल्म 'क्रांति' का वो सुनहरा दौर आंखों के सामने आ जाता है। एक ऐसा सितारा, जिसने कैमरे को देखे बिना ही किरदारों में जान फूंक दी। उनकी अदाकारी में ऐसी सादगी और गहराई थी कि हर सीन, हर डायलॉग अमर हो गया। आज वह सितारा सिनेमा के पर्दे से दूर चला गया, लेकिन उसकी रोशनी कभी फीकी नहीं पड़ेगी। अब वह आसमान में चमकेगा, जहां से उसकी विरासत हमेशा अपनी रोशनी बिखेरती रहेगी।

 

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