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सतयुग, त्रेतायुग और कलयुग तीन युगों से स्थित रहस्यमयी किले की कहानी

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उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में एक ऐसा रहस्यमयी किला है जिसने कई दौरों को गुजरते हुए देखा है यहां कि दीवारे और दरवाजे इतने ऊंचे और मजबूत हैं कि इस पर दुश्मन तोप से हमला करके भी इसे ध्वस्त नहीं कर पाए। हांलाकि कई ऐसे शासक आए जिन्होंने इस पर कब्जा करने का प्रयास किया, लेकिन सभी को आखिर में खाली हाथ ही लौटना पड़ा। वहीं इस किले की कुछ रहस्यमयी चीजों के बारें में जानकर आप हैरान हो जाएंगे। दरअसल, बुंदेलखंड इलाके को पानी की कमी के लिए भी जाना जाता है, लेकिन जिस पहाड़ी पर यह किला बना है वहां से हमेशा पानी रिसता रहता था। कहा जाता है कि बुंदेलखंड में सालों तक सूखा पड़ने के बाद भी कालिंजर दुर्ग की पहाड़ी से पानी रिसना कभी बंद नहीं हुआ, और आज के समय में भी यह एक कौतुहल का विषय है।

इस किले का प्राचीन काल में भी जिक्र किया गया है- 

जी हां हम बांदा जिले में स्थित प्राचीन काल के पहले से मौजूद कालिंजर किले के बारे में बात कर रहे हैं। आपको बता दें कि  इस किले का इतिहास में भी नाम दर्ज किया गया। जिस पर न जाने कितने शासकों की नजर रही हैं। ना जानें इसे हासिल करने के लिए कितने शासक तैयारी करके आए, लेकिन खाली हाथ ही वापस लौटे। लेकिन आज भी यह वर्तमान में उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद की सीमा में मौजूद है। विंध्य पर्वत की 900 फुट ऊंची पहाड़ी पर बना कालिंजर किला अपने अंदर कई खासियतें समेटे हुए है। मध्य प्रदेश के खजुराहो से 100 किमी की दूरी पर बने इस दुर्ग का इतिहास चंदेलों के शासनकाल सेभी  ज्यादा पुराना है। इतिहास के उतार-चढ़ावों का प्रत्यक्ष गवाह कालिंजर क़िला हर युग में अलग-अलग नाम से विद्यमान रहा है। इस क़िले की सतयुग में कीर्तिनगर, त्रेतायुग में मध्यगढ़, द्वापर युग में सिंहलगढ़ और कलियुग में कालिंजर, और कालिंजर दुर्ग के नाम से भी ख्याति पायी गई है। साथ ही कालिंजर दुर्ग का जिक्र बौद्ध साहित्य में भी किया गया है। भगवान बुद्ध की यात्रा वृतांत में भी इस दुर्ग का जिक्र है। यह ऐसा किला है जिसने देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक दौर को बदलते हुए देखा है, और शायद यही वजह है कि कई इतिकासकारों से लेकर राजा महाराजाओं की इसमें खास दिलचस्पी रही है।

कई शासकों की थी इस किले पर नजर- 

यह वो किला है जिस पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक और हुमायूं से लेकर शेर शाह सूरी तक ने कब्जा करना चाहा, लेकिन सफल नहीं हुए, उन्होंने जान की बाजी तक लगा दी, लेकिन कामयाब नहीं हुए। इतना ही नहीं इसे हासिल करने के लिए पृथ्वीराज चौहान से लेकर पेशवा बाजीराव तक ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कहा जाता है कि जिस समय दिल्ली की सल्तनत पर मुगलों का राज था जब चंदेल शासन में शेर शाह सूरी ने इस किले को फतह करने की कोशिश की थी पर वो जंग में मारा गया। उस समय शेर शाह सूरी वो शासक था जिसने हुमायूं को हराकर सूरी साम्राज्य की स्थापना की थी। लेकिन 1545 में कालिंजर को हासिल करने में उसकी मौत हो गई और यह हुमायूं के लिए सुनहरा मौका साबित हुआ। जिसका नतीजा ये हुआ कि हुमायूं ने फिर दिल्ली को जीत कर अगले 300 सालों तक मुगलों ने राज किया। 

इसी दौरान हुमायूं ने किले को हासिल करने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहा। हालांकि 1569 में अकबर ने इसे जीत कर अपने नवरत्नों में शामिल करके इसे बीरबल को तोहफे में दे दिया। इस कब्जे के बाद भी शासकों में कांलिजर को पाने चाहत कम नहीं हुई। एक दौर ऐसा भी आया जब राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव की मदद से बुंदेलखंड से मुग़लों को बेदखल करके दम लिया। इस तरह अंगेजों के आने तक यह राजा छत्रसाल की रिसासत का हिस्सा हो गया। इनके बाद क़िले पर पन्ना के हरदेव शाह का कब्जा हो गया और अतं में 1812 ई. में यह क़िला अंग्रेज़ों के अधीन हो गया।

किले के अन्दर नीलकंठ मंदिर भी है मौजूद-

कहा जाता है कि कालिंजर पहाड़ी की चोटी पर स्थित इस क़िले में अनेक स्मारकों और मूर्तियों का खजाना है। इन चीज़ों से इतिहास के विभिन्न पहलुओं का पता चलता है। चंदेलों द्वारा बनवाया गया यह क़िला चंदेल वंश के शासन काल की भव्य वास्तुकला का उदाहरण है। इस क़िले के अंदर कई भवन और मंदिर हैं। इस विशाल क़िले में भव्य महल और छतरियाँ हैं, जिन पर बारीक डिज़ाइन और नक्काशी की गई है। बता दे कि कालिंजर के मुख्य आकर्षणों में नीलकंठ मंदिर है। इसे चंदेल शासक परमादित्य देव ने बनवाया था। मंदिर में 18 भुजा वाली विशालकाय प्रतिमा के अलावा रखा शिवलिंग नीले पत्थर का है। मंदिर के रास्ते पर भगवान शिव, काल भैरव, गणेश और हनुमान की प्रतिमाएं पत्थरों पर उकेरी गयीं हैं। इतिहासवेत्ता कि यहां शिव ने समुद्र मंथन के बाद निकले विष का पान किया था। शिवलिंग की खासियत यह है कि उससे पानी रिसता रहता है। इसके अलावा सीता सेज, पाताल गंगा, पांडव कुंड, बुढ्डा-बुढ्डी ताल, भगवान सेज, भैरव कुंड, मृगधार, कोटितीर्थ, चौबे महल, जुझौतिया बस्ती, शाही मस्जिद, मूर्ति संग्रहालय, वाऊचोप मकबरा, रामकटोरा ताल, भरचाचर, मजार ताल, राठौर महल, रनिवास, ठा. मतोला सिंह संग्रहालय, बेलाताल, सगरा बांध, शेरशाह सूरी का मक़बरा व हुमायूं की छावनी आदि भी हैं।

 

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