सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की तरह, लाल बहादुर शास्त्री भी भारत के उन महापुरुषों में से थे जिनकी शिक्षा और सिद्धांत आने वाली पीढ़ियों को नेकी और सादगी की राह दिखाते रहेंगे। जिस दिन (2 अक्टूबर) गांधी जी का जन्मदिन मनाया जाता है, उसी दिन जन्मे शास्त्री जी ने अपनी विनम्रता, संघर्षशीलता और जमीन से जुड़े हुए दृष्टिकोण से भारतीय समाज पर अमिट छाप छोड़ी। शास्त्री जी ने यह साबित कर दिया कि सर्वोच्च पद पर रहकर भी व्यक्ति अपने मूल्यों को बनाए रख सकता है।
नन्हे शास्त्री: संघर्ष की शुरुआत
उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में 2 अक्टूबर 1904 को जन्मे शास्त्री जी को बचपन में प्यार से "नन्हे" बुलाया जाता था। साधारण परिवार से आने वाले शास्त्री जी की प्रारंभिक शिक्षा संघर्षों से भरी रही। तपती धूप में नंगे पांव स्कूल जाना, सिर पर किताबें बांध कर दो बार गंगा नदी पार करना – यह सब उनकी अद्वितीय लगन और आत्मशक्ति का प्रमाण था। आज के समय में जब लोग भौतिक सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहे हैं, शास्त्री जी का जीवन हमें सिखाता है कि साधारण साधनों में भी महानता संभव है।
विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल
शास्त्री जी का जीवन जितना साधारण था, उतनी ही गहरी थी उनकी सोच। वे बापू को अपना गुरु मानते थे और एक बार कहा था, "मेहनत प्रार्थना करने के समान है।" उन्होंने इस सिद्धांत को अपने जीवन में पूरी तरह अपनाया। जो नियम और अनुशासन वह देश के लिए लागू करते, उसे पहले अपने घर में ही सख्ती से पालन करते थे। उनकी विनम्रता, मृदुभाषिता और साधारण लोगों से जुड़ने की क्षमता उन्हें अद्वितीय बनाती थी।
1965 का युद्ध: साहस और रणनीति का प्रतीक
भले ही शास्त्री जी कद में छोटे थे, लेकिन उनका हृदय और साहस विशाल था। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने न केवल देश का कुशल नेतृत्व किया, बल्कि 'जय जवान, जय किसान' का प्रेरणादायक नारा देकर देश के सैनिकों और किसानों का मनोबल ऊंचा रखा। इस युद्ध के दौरान उन्होंने यह भी साबित किया कि भारत को संकट के समय एक दृढ़ और स्पष्ट नेतृत्व की आवश्यकता होती है, जो बिना डरे निर्णय ले सके।
'जय जवान, जय किसान': एक युगांतरकारी नारा
शास्त्री जी का दिया हुआ 'जय जवान, जय किसान' का नारा आज भी भारतीय समाज की रीढ़ है। जब देश में खाद्यान्न संकट था और पाकिस्तान से युद्ध चल रहा था, तब उन्होंने न केवल सैनिकों का हौसला बढ़ाया, बल्कि किसानों को भी प्रेरित किया। यह नारा शास्त्री जी की दृष्टि को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है कि देश की सुरक्षा और कृषि, दोनों ही उसकी समृद्धि और स्वतंत्रता के आधार हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
लाल बहादुर शास्त्री भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान सेनानियों में से थे जिन्होंने देश के गरीब और वंचित वर्ग के लिए निरंतर संघर्ष किया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनकी लड़ाई का उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता भी थी। उनके आदर्श हमें सिखाते हैं कि स्वतंत्रता केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि कर्तव्यों का भी नाम है।
शास्त्री जी के प्रेरणादायक विचार
शास्त्री जी के विचार आज भी हमारी ज़िन्दगी में प्रेरणा देने वाले हैं। उनके अनमोल विचार हर व्यक्ति के जीवन को दिशा दे सकते हैं। आइए जानते हैं उनके कुछ प्रमुख विचार:
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विज्ञान और अनुसंधान: "सफलता संसाधनों पर नहीं, बल्कि परेशानियों और लक्ष्यों को समझदारी से चुनने पर निर्भर करती है।"
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कानून और लोकतंत्र: "कानून के शासन का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना को मजबूत किया जा सके।"
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अनुशासन और एकता: "अनुशासन और संयुक्त प्रयास किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत हैं।"
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समानता: "यदि हमारे देश में एक भी व्यक्ति अछूत कहलाता है, तो यह हमारे लिए शर्म की बात होगी।"
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शांति और साहस: "हमें शांति के लिए उसी बहादुरी से लड़ना चाहिए जैसे युद्ध के लिए लड़ते हैं।"
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गरीबी और शिक्षा: "हमारी असली लड़ाई गरीबी, बीमारी और अशिक्षा के खिलाफ होनी चाहिए, न कि एक-दूसरे के खिलाफ।"
- प्रशासन और विकास: "प्रशासन का उद्देश्य समाज को एकजुट रखना है ताकि वह विकास कर सके और अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ सके।"
समर्पण और संघर्ष की प्रतीक-
शास्त्री जी ने यह सिद्ध कर दिया कि कद से नहीं, बल्कि कर्मों से व्यक्ति महान बनता है। उनके संघर्षों और बलिदानों ने हमें यह सिखाया कि कठिनाई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर मन में संकल्प हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। उनका जीवन और उनके विचार हमारे लिए प्रेरणा का असीम स्रोत हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को भी सच्चाई और विनम्रता की राह पर चलने का मार्गदर्शन करेंगे। शास्त्री जी की सादगी, निष्ठा और कर्तव्यपरायणता हमें हमेशा याद दिलाती रहेंगी कि सत्य और सेवा ही हमारे जीवन का मूल उद्देश्य होना चाहिए।