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किताब से पढ़ना मतलब वास्तविक पढ़ना

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(Special Story) किताबों का साथ सबसे खास है। एक टच में सिमटी दुनिया के दौर में भी विशेषज्ञ कागजी किताबों को ही दिमाग का असली ट्रिगर मानते हैं। भारत जैसे परम्परागत देश में ही अब डिजिटल एक फैशन की तरह प्रयोग में आने लगा है और बच्चों पर यह सबसे अधिक थोपा जा रहा है जबकि पश्चिमी देश अब अपने बच्चों को इस से दूर करना चाह रहे हैं।

स्वीडन में बदलाव की बयार-

स्वीडन के शिक्षा क्षेत्र में आ रहा एक बदलाव इन दिनों चर्चा में है। स्वीडन में पिछले कई सालों से पढ़ाई को पूरी तरह से डिजिटलाइज कर दिया गया था। परंतु 2023 में इस पैटर्न को बदलने का निर्णय लिया गया। सरकार ने पाया कि बच्चों के पढ़ाई के प्रदर्शन में लगातार गिरावट हो रही है। कई विश्लेषणों से पता चला कि इसकी बड़ी वजह पुस्तकों से दूरी है। यानी कॉपी, पेन और बुक्स से डिस्टेंस। इसलिए पढ़ने के प्रदर्शन में गिरावट का मुकाबला करने के लिए, स्वीडिश सरकार ने स्कूलों के लिए 2023 से लाखों पुस्तकें खरीदने की घोषणा की। इस सरकारी खर्च को 2024 और 2025 में जारी रखने का भी ऐलान किया। हालाँकि पढ़ने की क्षमता के मामले में स्वीडन के छात्रों का स्कोर यूरोपीय औसत से ऊपर है लेकिन चौथी कक्षा के पढ़ने के स्तर के एक अंतरराष्ट्रीय मूल्यांकन, प्रोग्रेस इन इंटरनेशनल रीडिंग लिटरेसी स्टडी (पीआईआरएलएस) ने 2016 और 2021  के बीच स्वीडन के बच्चों में गिरावट को उजागर किया है। 2021 में, स्वीडिश चौथी कक्षा के छात्रों का औसत 544 अंक था, जो 2016 के 555 औसत से कम है।

भारत में भी चर्चा जरूरी-

यहां ये चर्चा इसलिए जरूरी है क्योंकि भारत में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। महानगरों के कई बड़े शिक्षा संस्थान कॉपी, कलम और किताब की जगह टैब या अन्य गैजेट्स का इस्तेमाल करने लगे हैं। वो देश जो पूरी तरह डिजिटलाइज हो चुके हैं, फिजिकल मोड पर वापसी कर रहे हैं। तो हमें इस पर गहन चिंतन करना होगा। शिक्षा में डिजिटलाइजेशन के संतुलन पर ध्यान केंद्रित करना होगा। एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहां डिजिटल उपकरण सहायक की भूमिका निभाएं। प्राथमिक स्थान न लेने पाएं। प्राथमिकता पर हमेशा पुस्तकों भौतिक रूप से अध्ययन ही होना चाहिए।

यूनेस्को ने जताई चिंता-

डिजिटल शिक्षण उपकरणों को प्राथमिकता देने पर संयुक्त राष्ट्र शिक्षा और संस्कृति एजेंसी ने भी चिंता जाहिर की है। अगस्त 2023 में प्रकाशित रिपोर्ट में यूनेस्को ने शिक्षा में प्रौद्योगिकी के उचित उपयोग के लिए तत्काल आह्वान किया। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि स्कूलों में शिक्षा प्रौद्योगिकी इस तरह से लागू की जानी चाहिए जो कभी भी व्यक्तिगत, शिक्षक के नेतृत्व वाले निर्देश की जगह न ले। सभी के लिए क्वालिटी एजुकेशन के उद्देश्य का समर्थन करे।

क्या कहते हैं अध्ययन-

नवीनतम शोध बताते हैं कि कुछ मूलभूत कौशल सिखाने के लिए डिजिटल पाठ उपयोगी हो सकते हैं। परंतु वे दिमाग में धीमी, गहरी प्रक्रियाओं को विकसित नहीं करते हैं जो समझ, अवधारणा और ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि युवा पाठकों को वयस्कों के साथ पढ़ना चाहिए। इससे प्रतिक्रिया प्राप्त करना, प्रश्न पूछना और चित्रों को एक साथ देखना जैसी एक्टिविटी होती हैं। यह सब उन्हें शब्दावली और ज्ञान बनाने में मदद करता है ताकि वे जो पढ़ रहे हैं उसे समझ सकें। स्क्रीन अक्सर इस मानव-से-मानव संपर्क को दोहराने में खराब काम करती है। मस्तिष्क की आंतरिक कार्यप्रणाली पर किए गए अध्ययन इसी निष्कर्ष की पुष्टि करते हैं। इसी क्रम में उनका सुझाव है कि किताबें पढ़ना भी उस प्रगति से जुड़ा है।

रीडिंग सर्किट स्ट्रांग चाहिए तो किताब से पढ़िए-

एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने किताब व ऑडियोबुक के प्रयोग में अंतर को उजागर किया। उन्होंने पाया कि तीन और चार साल के बच्चों में मस्तिष्क के भाषा क्षेत्रों में तब अधिक सक्रियता होती है, जब वे किताब पढ़ते हैं। न कि जब वे ऑडियोबुक सुनते या डिजिटल ऐप से पढ़ते हैं। यही नहीं जब वे आईपैड पर पढ़ते थे, उस कंडीशन में तो सक्रियता सबसे कम थी। एक दूसरा अध्ययन 8 से 12 वर्ष के बच्चों पर किया गया। इसमें इन बच्चों का एमआरआई स्कैन किया गया। पता चला कि स्क्रीन पर समय बिताने वाले बच्चों की तुलना में कागजी किताबें ज्यादा पढ़ने वाले बच्चों के रीडिंग सर्किट अधिक मजबूत है। 12 वर्ष से अधिक उम्र के छात्रों पर हुए विभिन्न शोधों में भी अहम निष्कर्ष निकले। 33 अलग-अलग अध्ययनों के एक बड़े मेटा विश्लेषण से पता चला कि जब छात्र कागज पर पढ़ते हैं तो उन्हें अधिक तर्कसंगत तरीके से समझ में आता है।

डिजिटल से प्रदर्शन हुआ खराब-

रीबूट फाउंडेशन के एक अध्ययन का जिक्र अहम है। इसमें अमेरिका समेत 90 देशों के कक्षा 4 के हजारों छात्रों का मूल्यांकन किया गया। कुछ को पूरी तरह से टैबलेट से पढ़ाई करने को कहा गया। बाकी छात्रों को पुस्तकों के माध्यम से क्लासेज करवाई गईं। फिर रीडिंग टेस्ट में पता चला कि किताबें यूज करने वाले छात्रों की तुलना में टैबलेट यूज करने वाले छात्रों को 14 अंक कम मिले। शोधकर्ताओं ने स्कोर अंतर को सीखने के "पूर्ण ग्रेड स्तर के बराबर" कहा। जिन छात्रों ने "स्कूल के दिन के दौरान हर दिन कई घंटों तक" प्रौद्योगिकी का उपयोग किया, उनका प्रदर्शन सबसे खराब रहा, जबकि यह अंतर तब कम हो गया या गायब हो गया जब छात्र प्रतिदिन आधे घंटे से भी कम समय लैपटॉप या टैबलेट पर बिताते थे।

किताब से पढ़ना मतलब वास्तविक पढ़ना-

हाउ वी रीड नाउ: स्ट्रैटेजिक चॉइस फॉर प्रिंट, स्क्रीन और ऑडियो की लेखिका नाओमी बैरन कहती हैं कि वे अक्सर छात्रों से आमने सामने बैठकर बात करती हैं। छात्रों ने खुद महसूस किया है कि जब वे किताबें पढ़ते हैं, तो अधिक सीखते हैं। छात्र अक्सर कहते हैं कि किताब से पढ़ना "वास्तविक पढ़ना" है। उन्हें अपने हाथों में किताब का एहसास पसंद है। हालाँकि सुविधा या लागत के कारणों से डिजिटल प्रारूप काफी छात्रों को आकर्षक लगता है। परंतु उन्हें लगता है कि प्रिंट पढ़ते समय उनकी एकाग्रता अधिक होती है। प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीआईएसए) द्वारा किए गए अध्ययन में भी यही बात सामने आई। इसमें कागजी किताबें पढ़ने और पढ़ने की पसंद के बीच संबंध का संकेत दिया गया। प्रिंट पढ़ने की धीमी परंतु अधिक केंद्रित आदतों को सिखाता है। इसके बाद छात्र अपने कौशल के मुताबिक डिजिटल उपकरणों की मदद से खुद को पॉलिश कर सकते हैं। यही तरीका ज्यादा प्रभावी होता है।

समय नहीं स्किल बचाना हो उद्देश्य-

डिजिटल का प्रयोग सामान्यत: कम समय में ज्यादा काम को प्रेरित करता है। परंतु पढ़ाई के संबंध में इस मान्यता से बचना चाहिए। हमें समय नहीं गुणवत्ता बचाने पर जोर देना होगा। कोविड के दौरान डिजिटल रीडिंग का उपयोग तेजी से बढ़ा। करीब-करीब सभी पब्लिकेशन हाउसेज ने खुद को ऑनलाइन कर लिया। साक्षरता शिक्षक टिम शानहन का मानना है कि पढ़ाई में डिजिटल उपकरणों के प्रयोग को पूरी तरह नकारना भी उचित नहीं होगा। हां, तरीके ऐसे प्रभावी होने चाहिए जो कि फिजिकल रीडिंग को भी बनाए रखें और टेक्नोलॉजिकल रीच से भी बच्चे दूर ना हों। आज के दौर में डिजिटल होना भी जरूरी है। पर यह हमेशा सपोर्टिंक रोल में होगा तो परिणाम बेहतर होंगे। वह कहते हैं कि डिजिटल तकनीक को एक किताब की तरह बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बल्कि यह सोचने की ज़रूरत है कि बेहतर डिजिटल उपकरण कैसे तैयार किए जाएं। तकनीकी वातावरण पढ़ने के व्यवहार को बदल सकता है। इसलिए इसका उपयोग बड़ों की निगरानी में उत्पादकता को बढ़ाने के लिए हो, समय बचाने के लिए नहीं।

न्यूयॉर्क ने किया सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर मुकदमा-

न्यूयॉर्क में 14 फरवरी को दिलचस्प घटना घटी। शहर के मेयर एरिक एडम्स ने फेसबुक, टिकटॉक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और स्नैपचैट सहित प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफार्मों के खिलाफ मुकदमा करने की घोषणा की। एडम्स ने कहा कि पिछले एक दशक में हमने देखा है कि ऑनलाइन दुनिया कितनी व्यसनी और भारी हो सकती है। बच्चों का ऐसे कंटेट से सामना हो रहा है जिसके लिए वे तैयार नहीं हैं। विशेषत: मानसिक तौर पर। परिणाम ये है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। न्यूयार्क शहर की तरफ से किए गए मुकदमें में यह आरोप लगाया गया है कि न्यूयॉर्क शहर, इस देश के अन्य हिस्सों की तरह, अपने युवाओं के बीच एक अभूतपूर्व मानसिक स्वास्थ्य संकट और सार्वजनिक स्वास्थ्य में गंभीर व्यवधान से जूझ रहा है। जो प्रतिवादियों द्वारा नशे की लत और खतरनाक सोशल मीडिया प्लेटफार्मों के निर्माण और प्रचार से प्रेरित है। युवा अब बड़ी संख्या में प्रतिवादियों के प्लेटफार्मों के आदी हो गए हैं। इसके परिणामस्वरूप स्कूल जिले के संचालन में पर्याप्त हस्तक्षेप हो रहा है। शहरों, स्कूल जिलों और सार्वजनिक अस्पताल प्रणालियों पर बड़ा बोझ पड़ रहा है जो युवाओं को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करते हैं। हालांकि विभिन्न कंपनियों ने भी इस पर अपना जवाब दाखिल किया है।

Disclaimer

उपरोक्त लेख में लेखक के स्वयं के विचार हैं, इससे संस्थान का सहमत होना जरूरी नहीं है।

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