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तमिलनाडु सरकार के इस फैसले का राष्ट्र के आर्थिक एकता पर क्या असर पड़ेगा?

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अगर आप महाराष्ट्र में हैं और किसी दुकान पर ‘रु’ लिखा दिखे… फिर बंगाल जाते ही ‘৳’ नज़र आए… और पंजाब में एक नया ही मुद्रा चिह्न देखने को मिले! तो क्या यह भारत की आर्थिक एकता के लिए सही होगा? या फिर यह अलग-अलग राज्यों को अपनी अलग पहचान देने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम हो सकता है? तमिलनाडु सरकार ने अपने बजट दस्तावेज़ में ₹ की जगह 'ரு' (रुबाई) लिखकर इस बहस को हवा दे दी है। अब सवाल यह है कि क्या दूसरे राज्य भी अपने मुद्रा चिह्न बदल सकते हैं? आइए विस्तार से जानते हैं, अगर ऐसा हुआ, तो इसका देश की आर्थिक व्यवस्था और संघीय ढांचे पर क्या असर पड़ेगा? 

मुद्रा और बैंकिंग: केंद्र सरकार का अधिकार-

भारतीय संविधान के अनुसार मुद्रा और बैंकिंग नीति केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसका ज़िक्र सातवीं अनुसूची की संघ सूची में है। लेकिन राज्यों को अपनी प्रशासनिक भाषा में बदलाव करने की स्वतंत्रता है। वैसे भी ₹ कोई राष्ट्रीय प्रतीक नहीं है यानी, बजट दस्तावेजों में अपने राज्य की भाषा में मुद्रा को अलग तरीके से लिखना संवैधानिक रूप से संभव है, लेकिन आधिकारिक राष्ट्रीय मुद्रा चिह्न (₹) बदलने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

₹: भारत का आधिकारिक मुद्रा चिह्न (2010 से)

भारत में पहली बार 2010 में ₹ को आधिकारिक मुद्रा चिह्न के रूप में अपनाया गया था। इससे पहले, 'Rs.' और 'Re.' का इस्तेमाल होता था। लेकिन भारत में बहुभाषिकता के कारण क्या अब राज्यों को अपने अलग मुद्रा चिह्न अपनाने का अधिकार मिलना चाहिए?

अगर हर राज्य अपना अलग मुद्रा चिह्न अपनाने लगे, तो इसके कई असर होंगे - 

1️⃣ संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को बढ़ावा मिलेगा – महाराष्ट्र 'रु', बंगाल '৳', तमिलनाडु 'ரு' आदि लिखकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को मजबूत कर सकते हैं।
2️⃣ भाषाई विविधता को सम्मान मिलेगा – इससे स्थानीय भाषाओं का संरक्षण और संवर्धन होगा।
3️⃣ राज्यों को आर्थिक स्वायत्तता की भावना मिलेगी – बजट और सरकारी दस्तावेज़ों में अपनी भाषा में करेंसी चिह्न इस्तेमाल करना एक सशक्तिकरण का प्रतीक बन सकता है।

सभी राज्यों के अलग-अलग मुद्रा चिह्न अपनाने से बुरे प्रभाव

  • राष्ट्रीय आर्थिक एकता प्रभावित हो सकती है – अलग-अलग मुद्रा चिह्नों से वित्तीय लेन-देन में भ्रम की स्थिति बन सकती है।
  • डिजिटल पेमेंट और बैंकिंग पर असर पड़ेगा – ऑनलाइन ट्रांजैक्शन में एकरूपता बनाए रखना मुश्किल होगा।
  • निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भ्रम पैदा होगा – वैश्विक निवेशकों के लिए यह एक अस्थिरता का संकेत बन सकता है।

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