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कल्पना कीजिए, आप 28600 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से अंतरिक्ष में तैर रहे हैं, जहां गुरुत्वाकर्षण का कोई प्रभाव नहीं, समय जैसे ठहर गया हो, और चारों ओर केवल अनंत ब्रह्मांड का नजारा हो। लेकिन फिर, धरती की ओर वापसी शुरू होती है—एक ऐसा सफर, जो विज्ञान, धैर्य और रोमांच का अद्भुत संगम है।
भारतीय मूल की अमेरिकी एस्ट्रोनॉट सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर 9 महीने 14 दिन बाद आखिरकार 19 मार्च को पृथ्वी पर सुरक्षित लैंडिंग की। इनके साथ क्रू-9 के दो और एस्ट्रोनॉट अमेरिका के निक हेग और रूस के अलेक्सांद्र गोरबुनोव भी हैं। उनका स्पेसक्राफ्ट ड्रैगन कैप्सूल, भारतीय समयानुसार सुबह 3:27 बजे फ्लोरिडा के तट पर उतरा। लेकिन यह वापसी आसान नहीं थी—1650 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा तापमान, तेज़ी से गिरती ऊंचाई, और लगभग 7 मिनट का संचार ब्लैकआउट, जब यान से पृथ्वी का संपर्क पूरी तरह कट गया था। 22 साल पहले भी कुछ ऐसी ही घटना हुई थी लेकिन अफ़सोसनाक बात ये है कि तब उस अंतरिक्ष यात्री की जान नहीं बचाई जा सकी थी।
कल्पना चावला: अंतरिक्ष से वापसी जो अधूरी रह गई
1 फरवरी 2003 की वह काली घड़ी, जगह थी-टेक्सास (अमेरिका) नासा का अंतरिक्ष यान कोलंबिया शटल STS-107 तेजी से धरती की ओर बढ़ रहा था। भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला इस यान के ज़रिए अपना दूसरा अंतरिक्ष मिशन पूरा करके लौट रही थीं। धरती से लगभग 2 लाख फीट ऊपर और 20,000 किमी प्रति घंटे की गति से बढ़ रहे इस यान को सिर्फ 16 मिनट में लैंडिंग करनी थी। लेकिन अचानक, नासा का इस यान से संपर्क टूट गया। एक जबरदस्त धमाका हुआ और देखते ही देखते अंतरिक्ष यान आग के गोले में बदल गया।खबर आई कि कोलंबिया शटल क्रैश हो गया है। कल्पना चावला समेत सभी 7 अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई।
सिर्फ 16 मिनट की दूरी पर रुकी उड़ान
आज जब सुनीता विलियम्स की सुरक्षित वापसी पर देश जश्न मना रहा है, तो 2003 की वह दर्दनाक घटना भी याद आती है, जिसने पूरे भारत को गमगीन कर दिया था। कल्पना चावला ने पहली बार 19 नवंबर 1997 को अंतरिक्ष के लिए उड़ान भरी थी। वे 372 घंटे तक अंतरिक्ष में रही थीं। 16 जनवरी 2003 को जब उन्हें दोबारा अंतरिक्ष में जाने का मौका मिला, तो यह मिशन उनके लिए बेहद खास था। लेकिन 1 फरवरी 2003 को उनकी सुरक्षित वापसी नहीं हो सकी। टेक-ऑफ के दौरान यान के फ्यूल टैंक से निकले इंसुलेटिंग फोम के टुकड़े स्पेस शटल के बाएं पंख से टकरा गए, जिससे उसका थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम कमजोर हो गया। जैसे ही स्पेसक्राफ्ट वायुमंडल में दाखिल हुआ, तेज गर्मी और घर्षण की वजह से धमाका हुआ और यान नष्ट हो गया।
हरियाणा से लेकर अंतरिक्ष तक का सफर
1 जुलाई 1962 को हरियाणा के करनाल में जन्मी कल्पना चावला बचपन से ही आसमान की ऊंचाइयों को छूने का सपना देखती थीं। वे अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं और हवाई जहाजों के प्रति उनका गहरा लगाव था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा करनाल में ही हुई।
शिक्षा और करियर
B.Tech – पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग
मास्टर डिग्री – 1984 में टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग
दूसरी मास्टर डिग्री और PhD – 1986 में पूरी की
कल्पना चावला 1982 में अमेरिका गईं और 1991 में अमेरिकी नागरिकता मिलने के बाद नासा का हिस्सा बनीं।
पहली भारतीय मूल की महिला अंतरिक्ष यात्री
1997 में कल्पना चावला का सपना साकार हुआ, जब वे STS-87 मिशन के जरिए पहली बार अंतरिक्ष में गईं। उन्होंने 65 लाख मील की दूरी तय की और अंतरिक्ष में 376 घंटे बिताए। यह मिशन सफल रहा और उन्होंने पूरी दुनिया में भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री के रूप में अपनी पहचान बनाई। 16 जनवरी 2003 को वह अपने दूसरे मिशन पर निकलीं, लेकिन यह उनकी अंतिम यात्रा बन गई।
फैशन से नहीं, विज्ञान से था प्यार
कल्पना चावला एक टॉमबॉय पर्सनालिटी की थीं। उन्हें छोटे बाल रखना पसंद था और मेकअप या फैशन में उनकी कोई रुचि नहीं थी। जब उनकी बड़ी बहन की शादी हो रही थी, तब उन्होंने तीन दिनों तक एक ही कपड़े पहने रखे। जब उनसे इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा - "यह सब जरूरी नहीं है, इससे सिर्फ वक्त बर्बाद होता है।"
कल्पना चावला: एक अमर प्रेरणा
कल्पना चावला का नाम हमेशा इतिहास के पन्नों में चमकता रहेगा। उनकी यह सोच हमें प्रेरित करती है कि सपने देखने की कोई सीमा नहीं होती। अगर हौसला बुलंद हो तो आसमान भी छोटा पड़ जाता है। आज भी जब हम तारों की ओर देखते हैं, तो लगता है कि कल्पना चावला अब भी वहीं हैं... अंतरिक्ष में, हमारी प्रेरणा बनकर चमक रही हैं।
Baten UP Ki Desk
Published : 19 March, 2025, 1:45 pm
Author Info : Baten UP Ki