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मोहम्मद गोरी से लेकर आज तक...जानिए कैसा रहा भारत में वक्फ का सफर

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संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा वक्फ बोर्ड संशोधन बिल लोकसभा में पेश किए जाने के बाद से इसे लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। संसदीय समिति (जेपीसी) में इस बिल पर 44 संशोधन प्रस्तावित किए गए थे, जिनमें से 14 को स्वीकार किया गया। इससे पहले, कैबिनेट ने संशोधित बिल को मंजूरी दी थी। वक्फ क्या है और इसका भारत में इतिहास क्या कहता है? आइए जानते हैं।

 क्वया है क्फ का मतलब और महत्व?

वक्फ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका मूल "वकुफा" से लिया गया है, जिसका अर्थ ठहरना या रोकना होता है। इस्लाम में वक्फ का तात्पर्य ऐसी संपत्ति से है, जिसे जनकल्याण के लिए समर्पित किया गया हो। यह संपत्ति चल या अचल हो सकती है और इसे दान करने वाले व्यक्ति को 'वाकिफ' कहा जाता है। दान की गई संपत्ति को बेचा, उपहार में दिया या विरासत में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। इस्लाम में वक्फ का पहला उदाहरण खलीफा उमर के समय का मिलता है, जब उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के कहने पर अपनी जमीन जनसेवा के लिए समर्पित कर दी थी।

भारत में कब हुई वक्फ की शुरुआत?

भारत में वक्फ प्रथा इस्लाम के आगमन के साथ ही आई, लेकिन इसे शासकीय रूप से लागू करने का श्रेय दिल्ली सल्तनत के शासकों को दिया जा सकता है। इतिहासकार मानते हैं कि भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत 12वीं शताब्दी के अंत में मोहम्मद गोरी द्वारा की गई थी। उसने मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गांव दान किए थे, जिसे भारत में वक्फ संपत्ति का पहला उदाहरण माना जाता है। इसके बाद कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्तुतमिश ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

मुगल काल और ब्रिटिश शासन में वक्फ

मुगल शासकों, विशेष रूप से बाबर और अकबर, ने वक्फ को और अधिक संगठित रूप दिया। अकबर के शासनकाल में धर्मार्थ कार्यों और शैक्षणिक संस्थानों के लिए वक्फ संपत्तियों की संख्या बढ़ी। ब्रिटिश शासन के दौरान, 1913 में वक्फ व्यवस्था को औपचारिक रूप दिया गया और 1923 में वक्फ अधिनियम पारित किया गया। स्वतंत्रता के बाद, वक्फ संपत्तियों की देखरेख के लिए सरकार द्वारा कई संशोधन किए गए, जिनमें 1995 में किया गया संशोधन भी शामिल है।

भारत में वक्फ संपत्ति की स्थिति

आज, भारतीय रेलवे और भारतीय सेना के बाद, वक्फ बोर्ड भारत में तीसरा सबसे बड़ा जमींदार माना जाता है। वक्फ संपत्तियों में मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान, इमामबाड़े, मदरसे और अन्य धार्मिक व सामाजिक संस्थान शामिल हैं। लेकिन समय के साथ वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और अवैध कब्जों की शिकायतें बढ़ी हैं।

वर्तमान विवाद और चिंताएं

इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार, 'जिस संपत्ति का कोई मालिक नहीं होता, उस पर कब्जे की संभावना बढ़ जाती है।' उनका मानना है कि वक्फ संपत्तियों की निगरानी और पारदर्शिता बेहद जरूरी है। वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का कहना है कि 'वक्फ को लेकर कई भ्रांतियां फैलाई जाती हैं। कोई भी जमीन जबरन वक्फ नहीं की जा सकती, बल्कि यह व्यक्तिगत स्तर पर किया गया दान होता है।'

क्या बदलाव लाएगा नया संशोधन बिल?

केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित संशोधन बिल वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और पारदर्शिता को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव लाने का दावा करता है। लेकिन कई लोग इसे सरकारी हस्तक्षेप मानते हैं और इसे वक्फ संपत्तियों पर कब्जे की कोशिश के रूप में देखते हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि नया बिल इस व्यवस्था में कितना सुधार ला पाता है।

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