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लाल सागर — यह केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा है। विश्व के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 12-15% और वैश्विक तेल व्यापार का 8-10% इसी मार्ग से गुज़रता है। बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते सुएज़ नहर तक पहुँचने वाला यह मार्ग एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा समुद्री रास्ता है।
नवंबर 2023 से यमन के हूती विद्रोहियों ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग में जहाज़ों पर हमले शुरू किए। गाज़ा युद्ध के प्रतिशोध में की गई इस कार्रवाई ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया। भारत जैसे देश के लिए यह संकट विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि भारत का यूरोप के साथ 60% से अधिक व्यापार इसी मार्ग से होता है।
हूती (Ansar Allah) यमन में शिया मुस्लिम विद्रोही समूह है जो 2014-15 से यमन के बड़े हिस्से को नियंत्रित करता है। ईरान के समर्थन से यह समूह अत्याधुनिक ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल और समुद्री खदानों का उपयोग कर रहा है। गाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद से इन्होंने इज़राइल और उसके सहयोगी देशों से जुड़े जहाज़ों को निशाना बनाना शुरू किया।
अब तक 100 से अधिक जहाज़ों पर हमले हो चुके हैं। कई जहाज़ डुबोए गए हैं और नाविकों को बंधक बनाया गया है। इसके जवाब में अमेरिका और ब्रिटेन ने Operation Prosperity Guardian के तहत सैन्य कार्रवाई की, लेकिन हूती हमले जारी हैं।
भारत का यूरोप के साथ वार्षिक व्यापार लगभग 140 अरब डॉलर का है, जिसका अधिकांश हिस्सा लाल सागर मार्ग से होता है। हूती हमलों के कारण शिपिंग कंपनियों ने जहाज़ों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते मोड़ना शुरू किया। इससे यात्रा की दूरी 6,000-7,000 किलोमीटर और समय 10-15 दिन बढ़ गया है।
शिपिंग लागत में तीन से चार गुना वृद्धि हुई है। 40 फुट कंटेनर की ढुलाई लागत जो पहले 1,500-2,000 डॉलर थी, बढ़कर 6,000-8,000 डॉलर हो गई। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर सीधा असर पड़ा है। कपड़ा, चमड़ा, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामान के निर्यातक सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
आयात के मोर्चे पर भी चुनौतियाँ बढ़ी हैं। यूरोप से मशीनरी, रसायन और उर्वरकों का आयात महँगा हो गया है। देरी और अनिश्चितता के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है जिससे घरेलू उद्योगों में कच्चे माल की किल्लत और उत्पादन लागत में वृद्धि हुई है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी तेल ज़रूरतों का 85% आयात करता है। मध्य-पूर्व से भारत को आने वाला अधिकांश तेल अदन की खाड़ी से होकर गुज़रता है। हूती हमलों ने इस मार्ग को अनिश्चित बना दिया है।
हालाँकि भारत ने रूस से तेल आयात बढ़ाकर इस जोखिम को कुछ हद तक कम किया है। रूसी तेल की हिस्सेदारी भारत के कुल तेल आयात में बढ़कर 35-40% हो गई है। लेकिन मध्य-पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति यदि और बिगड़ती है, तो भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई रणनीति अपनानी होगी।
भारत ने लाल सागर में अपने नागरिकों और जहाज़ों की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना के जहाज़ों को तैनात किया है। INS विशाखापट्टनम, INS कोच्चि और अन्य युद्धपोतों ने इस क्षेत्र में गश्त बढ़ाई है और कई मौकों पर भारतीय जहाज़ों को बचाया है।
व्यापारिक मोर्चे पर भारत ने वैकल्पिक मार्गों और बाज़ारों की तलाश शुरू की है। IMEC (India-Middle East-Europe Corridor) जैसी परियोजनाएँ भविष्य में लाल सागर पर निर्भरता कम करने में सहायक हो सकती हैं। इसके अलावा, चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया से जुड़ाव भी एक विकल्प के रूप में उभर रहा है।
लाल सागर संकट ने वैश्विक स्तर पर व्यापार की लागत बढ़ाई है। विशेष रूप से यूरोपीय देशों में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ी हैं। शिपिंग कंटेनरों की कमी से उत्पन्न बोतल-नेक की स्थिति ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो वैश्विक GDP वृद्धि पर 0.5-1% का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। भारत के लिए भी यह संकट कुल व्यापार में 10-15 अरब डॉलर तक का नुकसान कर सकता है।
लाल सागर संकट ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि वैश्विक व्यापार में भू-राजनीतिक जोखिम कितने महत्वपूर्ण हैं। भारत के लिए यह संकट एक चेतावनी है कि देश को अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविधीकृत करना होगा और समुद्री सुरक्षा क्षमताओं को मज़बूत करना होगा। नौसेना की बढ़ती उपस्थिति, IMEC जैसे वैकल्पिक कॉरिडोर और ऊर्जा विविधीकरण — ये तीन रणनीतियाँ भारत को इस प्रकार के भविष्य के संकटों से बचाने में सहायक होंगी।
Baten UP Ki Desk
Published : 12 March, 2026, 5:21 pm
Author Info : Baten UP Ki